हरिद्वार।
शांतिकुंज हरिद्वार में आयोजित हो रहा वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी का जन्मशताब्दी समारोह न केवल युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की विचारधारा का विराट उत्सव है, बल्कि यह आदिवासी समाज के उस मौन किंतु सशक्त योगदान को भी राष्ट्रीय पटल पर उजागर कर रहा है, जिसने आध्यात्मिक जागरण की अलख को दूर-दराज़ के अंचलों तक पहुँचाया है।
अखिल विश्व गायत्री परिवार के जनक युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने आदिवासी संस्कृति को भारतीय सांस्कृतिक धारा का अभिन्न अंग मानते हुए इसके संरक्षण और उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए। उन्होंने प्रकृति पूजक, सहज और आत्मिक चेतना से संपन्न इस समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जागरण अभियानों की नींव रखी। इसी क्रम में गायत्री परिवार द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में गायत्री मंदिरों, यज्ञशालाओं एवं प्रज्ञा मंदिरों की स्थापना की गई, जिससे वहाँ सामाजिक चेतना, आत्मगौरव और नैतिक मूल्यों का नवसंस्कार हुआ।
आज आदिवासी भाई-बहन गायत्री परिवार की ‘युग निर्माण योजना’ को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। विभिन्न अभियानों के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और नैतिक जागरण के कार्यों में उनकी सहभागिता उल्लेखनीय है। विशेष रूप से आदिवासी युवा गायत्री चिंतन सत्रों से जुड़कर आत्मविकास की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं और अखंड ज्योति अभियान की प्रकाश-धारा को ग्रामीण व वनांचलों तक पहुँचा रहे हैं।
अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या की आध्यात्मिक प्रेरणा ने आदिवासी समाज को सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बना दिया है। परंपरा और प्रगति के संतुलन के साथ वे यह सिद्ध कर रहे हैं कि विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक भी होना चाहिए। उनका यह योगदान राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में एक सशक्त आधार स्तंभ के रूप में उभर रहा है।
जन्मशताब्दी के इस पावन अवसर पर आदिवासी समुदाय द्वारा किए गए सामूहिक योगदान ने सम्पूर्ण वातावरण को दिव्य ऊर्जा से भर दिया है। इसी भावना के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए शताब्दी समारोह में आदिवासी समाज के योगदान को समर्पित विशेष प्रस्तुतियाँ भी आयोजित की जा रही हैं, जो उनकी साधना, सेवा और समर्पण की जीवंत अभिव्यक्ति होंगी।
